और इस तरह से कई मार्केटिंग कंपनी में बतौर ट्रेनर और मनेजेरिअल पोस्ट पे कार्य किया उन्ही दिनों मेरे पिताजी का देहांत हो गया ....दिल को बहुत सदमा पंहुचा ...लेकीन मैंने हिम्मत से काम लिया ....घर गया उनकी मिटटी में सामिल होने के लिए ....परिवार वालों के साथ अपने गम को हल्का किया .....फिर दिल्ली वापिस हो लिया .....
और फिर इस तरह से जिंदगी के सफ़र में संघर्स की राह में निकल पड़ा......
और इस तरह से इग्नू का बी ए का प्रथम वर्स पूरा हुआ और साथ ही आई टी आई का भी, फिर आई टी आई को पूरा करने के लिए मैंने बी ए का पहला भाग पास करने के बाद इसे बिच में ही ड्रॉप कर दिया, और आई टी आई का दूसरा भाग पूरा किया ....चुकी पढ़ाई में अच्छा करने की वजह से जिल्लेट कंपनी में मुझे Apprentiship के लिए सेलेक्ट कर लिया गया, इसलिए मुझे एक साल और इलेक्ट्रिकल का कोर्से करना पड़ा....इसके बाद फिर मेरी पहली कंपनी में जिसमे नौकरी लगी, वो थी V Automate जो की ओखला में है ...परन्तु पेपर की वजह से वह नौकरी छूट गई ... और मेरा करियर वही सी मार्केटिंग की तरफ चला गया मेरी पहली कंपनी wwi थी वहां कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली तो दूसरी कंपनी Maitini International ज्वाइन किया ..........
मालवीय नगर में आईटीआई इलेक्ट्रिकल ट्रेड में बमुश्किल प्रवेस मिल गया... इसप्रकार से दोनों क्लास्सेस शुरू हो गई ....आरम्भ में तो कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ...परन्तु फिर मानो जैसे दिनचर्या बन गयी ...दोनों क्लास अटेंड करने की ....रेगुलर कोर्सेस आईटीआई का कॉरेस्पोंडेंस इग्नो का ....लेकिन इतवार और सनिवार इग्नो की क्लास अटेंड करनी पार्टी थी .....
दिल्ली में आकर सबसे पहले तो १० दिन तक दिल्ली में घूमता रहा अच्छी तरह से रास्तों के बारे में मालूमात की ...... अपने भाई जान के साथ रहता था ......और वो इलाका था गढ़ी का ..... बड़ा मजा आया ....दिल्ली घुमने का ....फिर क्या था येही कॉलेज में इग्नू में मैंने परवेश ले लिया ...और साथ ही एक टेक्नीकल कोर्से के लिए भी मेरी पढ़ाई शुरू हो गई ......................
इस तरह से हमारी दोस्ती आगे बढती गयी और फिर वो दिन भी सामने आया .....जिसके बारे में हमने सोचा भी न था ......हमारी आई. एस सी की पढाई पूरी हुई मैं ने परीक्षा पास कर लिया और रवि ने भी .....लेकिन रवि उसी कॉलेज में आगे की पढ़ाई करता रहा .... परन्तु मेरे परिवार वालों ने मुझे आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजना ठीक समझा और मैं सन १९८९ इश्वी में दिल्ली आ गया ..........और हमारे न चाहने के बावजूद हमें एक दुसरे से जुदा होना पड़ा .....
यह भी एक बड़ी अजीब इत्तफाक है के पहले दिन पहली दफा की मुलाकात में मैंने उसे अपना नाम राज और उसने अपना नाम रवि बताया .....जो की ही उस ज़माने में (१९८६) में.... हमारा निक नाम था ....उसका असल नाम उमेश और मेरा रेयाज़ .....दुसरे दिन इसबात का खुलासा होने पर दोनों ही बड़े जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगे .....और फिर हम दोनों एक अच्छे दोस्त की तरह रोज एक साथ कॉलेज आते पढ़ाई करते और शाम को घर चले जाते .......
उर्स में हिस्सा लेने के बाद मेले में घुमने का और खाने पिने का बड़ा मजा आता था...आज भी जब याद आती है वहां की तो उसमे सरिक होने को जी चाहता है .....इंसा अल्लाह फिर अगर मौका मिला तो जरूर तसरीफ ले जाऊंगा... जब कॉलेज में पहले दिन मेरी एंट्री हुई तो उस वक़्त बड़ी मुस्कील से अपने क्लास रूम का पता लगा .... जब उसमे दाखिल हुआ तो कोई भी नहीं था.... मैं एक सीट पे बैठ गया ..... थोड़ी देर के बाद एक और बिद्यार्थी आया ..... कुछ देर तक तो हम दोनों खामोस बैठे रहे ..... फिर उसने मुझसे मेरे बारे में पूछा और मैंने उसके बारे में इस तरह से हमारी जान पेहछान हो गई और हम दोनों दोस्त बन गए .... उसका नाम रवि है .....